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post authorAdmin 26 Mar 2026

हरिद्वार में कुंभ की आरक्षित जमीनों पर कब्ज़े का आरोप: संतों और प्रशासन से धर्मनगरी के संरक्षण की अपील.

हरिद्वार। धर्मनगरी Haridwar में कुंभ मेले की आरक्षित भूमि पर अवैध कब्जों और निर्माण को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की गई है। भूमा निकेतन उत्तरी हरिद्वार के प्रबंधक राजेंद्र ने कहा है कि वर्षों से कुंभ मेले के लिए सुरक्षित रखी गई भूमि धीरे-धीरे महलों और स्थायी निर्माणों में बदलती जा रही है, जिससे धर्मनगरी का मूल स्वरूप खतरे में पड़ता दिखाई दे रहा है।

राजेंद्र के अनुसार उन्होंने वर्ष 1980 में पहला कुंभ मेला देखा था। उस समय वे प्रसिद्ध भूमा पीठाधीश्वर की सेवा में आए और आश्रम प्रबंधन की जिम्मेदारी संभाली। उस दौर में संतों और अखाड़ों के लिए स्थायी भूमि या सुविधाएं सीमित थीं। सरकार कुंभ मेले के दौरान संतों के शिविर लगाने के लिए अस्थायी स्थान उपलब्ध कराती थी।

उन्होंने बताया कि उस समय संत रेत के टीलों और लकड़ी के मचानों पर रहकर साधना करते थे। प्रवचन और धर्म प्रचार के माध्यम से देश-विदेश से आए श्रद्धालुओं को आध्यात्म से जोड़ते थे। भले ही भव्यता कम थी, लेकिन आध्यात्मिक वातावरण अत्यंत गहरा होता था।

राजेंद्र ने वर्ष 1986 के कुंभ मेले का उदाहरण देते हुए बताया कि बैरागी कैंप से लगभग दो किलोमीटर दूर देवरहा बाबा का मचान लगता था। उस समय कुंभ का स्वरूप अधिक प्राकृतिक और संत परंपरा के अनुरूप था।

हालांकि वर्तमान स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि अब संतों और अखाड़ों को विभिन्न स्थानों पर भूमि आवंटित की गई है, लेकिन कई जगहों पर इन भूमियों का संरक्षण नहीं हो पाया। जिन स्थानों को कुंभ मेले के लिए आरक्षित किया गया था, वे धीरे-धीरे स्थायी निर्माणों और आलीशान भवनों में परिवर्तित हो गए हैं।

उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ स्थानों पर अप्रत्यक्ष रूप से जमीनों की खरीद-फरोख्त भी हुई है। इस विषय पर न तो सरकारों ने गंभीरता से ध्यान दिया और न ही संत समाज ने समय रहते संरक्षण की पहल की।

राजेंद्र ने कहा कि सप्तऋषि क्षेत्र में पहले नदी का किनारा पूरी तरह खाली रहता था, जबकि अब बांध और नदी के बीच भी फ्लैट बन चुके हैं। उनका कहना है कि कई कब्जे राजनीतिक संरक्षण में हुए हैं।

उन्होंने उत्तर प्रदेश के सिंचाई विभाग की अनदेखी और उत्तराखंड शासन की निष्क्रियता को भी जिम्मेदार ठहराया। उनका कहना है कि जिन स्थानों पर कभी धर्म और आध्यात्म का केंद्र हुआ करता था, वहां आज अवैध कारोबार तक हो रहे हैं।

अंत में उन्होंने शासन-प्रशासन और संत समाज से अपील की कि धर्मनगरी हरिद्वार के मूल स्वरूप और कुंभ की पवित्र भूमि को संरक्षित करने के लिए ठोस कदम उठाए जाएं, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इस आध्यात्मिक परंपरा को उसी रूप में देख सकें।

Kumbh Memories haridwar Kumbh Lands Transformed into Palaces Very Character of Holy City Is at Risk

                       राजेंद्र, प्रबंधक भूमा निकेतन उत्तरी हरिद्वार