देहरादून।
मोहन भागवत ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के शताब्दी वर्ष कार्यक्रम में राष्ट्र को आत्मनिर्भर और सशक्त बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि भारत को इतना मजबूत बनाना होगा कि कोई भी देश हमें टैरिफ या आर्थिक दबाव का भय न दिखा सके।
उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा, “विश्व सत्य को नहीं, शक्ति को पहचानता है। कमजोर को सभी दबाते हैं।” भागवत ने कहा कि यदि राष्ट्र सुरक्षित और प्रतिष्ठित है, तभी विश्व में उसकी स्थिति मजबूत रहती है। यदि हम शक्तिशाली नहीं हैं, तो देश के भीतर भी सुरक्षित नहीं रह सकते।
स्वदेशी व्यवस्था को मजबूत करने पर जोर
संघ प्रमुख ने कहा कि भारत को विकसित राष्ट्र और ‘विश्व गुरु’ बनने के लिए अपनी स्वदेशी व्यवस्था को सुदृढ़ करना होगा। उन्होंने विश्वास जताया कि आने वाले समय में विश्व का हर मार्ग भारत से होकर गुजरेगा।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि एक समय युगांडा के तानाशाह ईदी अमीन ने भारतीयों को देश से बाहर निकाल दिया था, लेकिन आज भारतीय विश्वभर में सम्मान और सुरक्षा के साथ रह रहे हैं। यह भारत की बढ़ती शक्ति का संकेत है।
समाज की एकता और अनुशासन पर बल
भागवत ने कहा कि समाज की गुणवत्ता और एकता से ही देश का उत्थान संभव है। उन्होंने संस्कार और तकनीक के संतुलन की आवश्यकता बताई और कहा कि तकनीकी विकास मानवता और अनुशासन की कीमत पर नहीं होना चाहिए।
उन्होंने युवाओं, विशेषकर ‘Gen Z’ को संबोधित करते हुए कहा कि उनके प्रश्नों का उत्तर ज्ञान और सही जानकारी से देना होगा। उन्हें आदर्श प्रस्तुत करने होंगे।
आरक्षण पर स्पष्ट रुख
भागवत ने कहा कि जब तक समाज में भेदभाव मौजूद है, तब तक आरक्षण जारी रहना चाहिए। संविधान में दिए गए प्रावधानों का पालन आवश्यक है। उन्होंने यह भी कहा कि सामाजिक चेतना के कारण कई संपन्न लोग स्वयं आरक्षण का लाभ छोड़ रहे हैं।
उन्होंने स्वीकार किया कि आज भी शहरों और गांवों में अलग-अलग रूपों में सामाजिक विषमता और भेदभाव मौजूद है। इसे सामाजिक समरसता से ही समाप्त किया जा सकता है।



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