उत्तराखंड के पहाड़ी गांवों में सूरज ढलते ही सन्नाटा पसर जाता है। यह सन्नाटा परंपरा या त्योहार का नहीं, बल्कि भय का परिणाम है। जंगलों से सटे गांवों में शाम होते ही लोग घरों में कैद हो जाते हैं—मानो अघोषित कर्फ्यू लागू हो गया हो। खेतों की रखवाली, मवेशियों को बाहर निकालना, बच्चों का खेलना या यहां तक कि शौच के लिए घर से बाहर निकलना भी जानलेवा जोखिम बन चुका है।
गुलदार, भालू, हाथी और अब बंदर—इन सभी की बढ़ती और आक्रामक मौजूदगी ने सामान्य जनजीवन को पूरी तरह बदल दिया है। कई गांवों में रात-भर पहरा देना मजबूरी बन गया है, सामाजिक गतिविधियां ठप हैं और खेती लगभग असंभव होती जा रही है। यह अब अलग-अलग घटनाओं का सिलसिला नहीं, बल्कि एक स्थायी और गहराता संकट है, जिसका असर सुरक्षा, शिक्षा, खेती और सबसे अधिक पलायन पर साफ दिखाई देता है।
बीते 25 वर्षों में उत्तराखंड में तेंदुओं के हमलों की 2683 घटनाएं दर्ज हुई हैं—2126 लोग घायल हुए और 547 लोगों की जान गई। औसतन हर महीने 8 से अधिक हमले सामने आते हैं। कई घटनाएं घरों, आंगनों और खेतों तक में हुई हैं। पौड़ी गढ़वाल के गजल्ड गांव में हालिया तेंदुआ हमला, जिसमें एक ग्रामीण की मौत हुई, कोई अपवाद नहीं बल्कि रोजमर्रा की सच्चाई है।
साल 2025 में अब तक 438 वन्यजीव हमले दर्ज हुए हैं—44 मौतें और 394 लोग घायल। तेंदुआ, भालू, बाघ, हाथी और सांप—सब शामिल हैं, लेकिन पर्वतीय जिलों में सबसे ज्यादा खौफ गुलदार और भालू का है।
सबसे ज्यादा प्रभावित जिलों में पौड़ी गढ़वाल, रुद्रप्रयाग, टिहरी, चमोली, पिथौरागढ़ और नैनीताल शामिल हैं। अकेले पौड़ी गढ़वाल में 55 से ज्यादा स्कूल या तो बंद हो चुके हैं या उनके समय में बदलाव करना पड़ा है। बंदर, लंगूर और जंगली सूअर फसलों को तबाह कर रहे हैं। अब बंदरों के हमलावर होने से खेती छोड़ने की नौबत आ गई है और गांव खाली होते जा रहे हैं।
वन विभाग के अनुसार 490 गांव मानव–वन्यजीव संघर्ष की दृष्टि से “हाई-रिस्क” घोषित किए गए हैं। कई जगह ग्रामीण खुद रात में पहरा दे रहे हैं। उत्तरकाशी, पौड़ी और टिहरी में भालू हमलों में तेजी आई है—14 लोग घायल, 2 की मौत और 53 पशु मारे या घायल हुए। उत्तरकाशी के टकनौर क्षेत्र में भालू और उसके शावकों का घरों के आंगन तक पहुंचना सीसीटीवी में कैद हुआ है।
प्रमुख वन संरक्षक रंजन मिश्रा के अनुसार संवेदनशील इलाकों में विशेष योजनाएं चलाई जा रही हैं—जन-जागरूकता, झाड़ी कटान, अतिरिक्त मानव-बल, त्वरित इलाज और खर्च की प्रतिपूर्ति जैसे उपाय किए जा रहे हैं। भालू हमलों में गंभीर रूप से घायलों के लिए 10 लाख रुपये तक अनुग्रह राशि का प्रस्ताव भी भेजा गया है।
गढ़वाल सांसद अनिल बलूनी और महेंद्र भट्ट ने इस मुद्दे को संसद तक उठाया है। विशेषज्ञ मानते हैं कि जलवायु परिवर्तन—बदलता तापमान, अनियमित बारिश, सूखते जलस्रोत और टूटते वन गलियारे—वन्यजीवों को भोजन और पानी की तलाश में गांवों की ओर धकेल रहे हैं।
पिछले 25 वर्षों में 1264 से ज्यादा मौतें, 6519 से अधिक घायल और हजारों हमले—यह आंकड़े बताते हैं कि डर आज पलायन का सबसे बड़ा कारण बन चुका है। मशहूर शिकारी जॉय हुकिल, जिन्होंने 47 आदमखोर तेंदुओं को मार गिराया, कहते हैं—पहले पकड़ने और शिफ्ट करने की कोशिश होती है, गोली आखिरी विकल्प होता है।
उत्तराखंड आज निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। यदि मानव और वन्यजीवों के बीच संतुलन के लिए ठोस, दीर्घकालिक और जलवायु-संवेदनशील नीति नहीं बनी, तो देवभूमि के गांव वीरान होने में देर नहीं लगेगी।



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