नवजात शिशु का पहला रोना दुनिया का सबसे परिचित दृश्य है। लेकिन सवाल यह है कि जन्म लेते ही बच्चा रोता क्यों है? और वह मुस्कुराना कई हफ़्तों बाद ही क्यों शुरू करता है?
वैज्ञानिकों के अनुसार, जन्म के समय बच्चे का रोना दर्द की वजह से नहीं होता, बल्कि यह शरीर के ज़रूरी सिस्टम के सक्रिय होने का संकेत है। गर्भ में बच्चा गर्म और सुरक्षित वातावरण में रहता है—उसके फेफड़े तरल से भरे होते हैं और उसने कभी हवा में सांस नहीं ली होती। जन्म के साथ ही फेफड़ों में पहली बार हवा प्रवेश करती है, जिससे दबाव बढ़ता है और रोना ट्रिगर होता है। यह पल डॉक्टरों के लिए बच्चे का पहला “सिस्टम ऑन” संकेत माना जाता है।
बाहर की ठंडी हवा, तेज़ रोशनी, आवाज़ें और ग्रेविटी का असर भी नवजात के नर्वस सिस्टम पर अचानक दबाव डालता है, और रोना एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया बन जाता है।
डॉक्टरों के अनुसार, पहला रोना बच्चे की अच्छी सेहत की निशानी है। अपगार स्कोर के आधार पर यह आकलन किया जाता है कि बच्चा सही तरह से सांस ले रहा है या नहीं। यदि बच्चा नहीं रोता है, तो डॉक्टर पीठ रगड़कर या हल्के थपथपाकर सांस की प्रक्रिया एक्टिवेट करते हैं।
कुछ दुर्लभ मामलों में बच्चे बिना रोए भी पैदा होते हैं, लेकिन जब तक वे सामान्य रूप से सांस ले रहे हैं और उनका रंग ठीक है, उन्हें स्वस्थ माना जाता है। दूसरी ओर, मुस्कुराते हुए जन्म लेने का कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण मौजूद नहीं है। मुस्कुराने के लिए दिमाग के विकसित न्यूरल सर्किट की आवश्यकता होती है, जो जन्म के कुछ सप्ताह बाद परिपक्व होते हैं। शुरुआती दिनों में दिखने वाली हल्की मुस्कान केवल रिफ्लेक्स होती है, वास्तविक इमोशन नहीं।
नवजात का पहला रोना जीवन का वह प्राकृतिक संगीत है जो घोषणा करता है—
“मैं आ गया हूँ, और दुनिया का सामना करने के लिए तैयार हूँ।”



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