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post authorAdmin 10 Dec 2025

लोकसभा में त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने उठाया हिमालयी फसलों के विलुप्त होने का मुद्दा.

नई दिल्ली: हरिद्वार सांसद और पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने लोकसभा में हिमालयी और पर्वतीय क्षेत्रों की पारंपरिक फसलों के तेजी से विलुप्त होने पर गंभीर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन, प्रवासन और वाणिज्यिक खेती के कारण कई महत्वपूर्ण फसलें अब संकटग्रस्त स्थिति में पहुँच रही हैं।

रावत ने केंद्र सरकार से पूछा कि क्या सरकार के पास ऐसी फसलों की अद्यतन जानकारी है और क्या इन फसलों के संरक्षण तथा पुनर्जीवन के लिए कोई व्यापक कार्यक्रम चलाया जा रहा है। उन्होंने आईसीएआर और नेशनल जीन बैंक द्वारा उठाए गए कदमों की विस्तृत जानकारी भी मांगी।

केंद्र सरकार की ओर से दिए गए विवरण

कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री रामनाथ ठाकुर ने बताया कि आईसीएआर और नेशनल जीन बैंक ने अब तक कुल 1,00,086 संकटग्रस्त या विलुप्तप्राय किस्मों का संरक्षण और दस्तावेजीकरण किया है। इनमें 85,587 भू-प्रजातियाँ और 14,499 पारंपरिक कृषक किस्में शामिल हैं।

उन्होंने कहा कि पोषक तत्वों से भरपूर मिलेट, छद्म-अनाज और औषधीय पौधों के संरक्षण और प्रसार को बढ़ावा देने के लिए कई कार्यक्रम चल रहे हैं। ‘अंतरराष्ट्रीय मिलेट वर्ष 2023’ ने इस दिशा में जागरूकता और अनुसंधान को नई गति दी है। साथ ही, पर्वतीय क्षेत्रों की जैविक उपज के लिए FPO निर्माण, मार्केट लिंकेज और मंडियों में विशेष स्थान उपलब्ध कराए जा रहे हैं।

पूर्व मुख्यमंत्री की राय

त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने कहा कि उत्तराखंड समेत पूरे हिमालयी क्षेत्र की पारंपरिक फसलें सिर्फ कृषि उत्पाद नहीं, बल्कि सांस्कृतिक धरोहर, पोषण सुरक्षा और स्थानीय जैव-विविधता का आधार हैं।
उन्होंने कहा कि इन फसलों का तेजी से गायब होना चिंताजनक है और इनके संरक्षण, बीज बैंकिंग, प्रसंस्करण और विपणन को मजबूत करना अब अत्यंत आवश्यक है।
रावत ने हिमालयी कृषि को नई दिशा देने के लिए मिलेट, छद्म-अनाज और औषधीय पौधों को मुख्यधारा में लाने वाले बड़े कार्यक्रम शुरू करने की मांग की।